POCSO Act

पॉक्सो एक्ट में सजा से बचने का तरीका क्या है एक गलती से फांसी से लेकर उम्रकैद तक की हो सकती है सजा|

How to avoid punishment under POCSO Act-पॉक्सो अधिनियम भारत के सबसे खतरनाक कानूनों में से एक है इसकी एक एक धारा लंबे समय तक सजा का प्रावधान करती है इसमें कुछ धाराएं तो ऐसी है जिसमें उम्रकैद से लेकर फांसी तक की सजा का प्रावधान है अपराधों से बच्चों का संरक्षण करने संबंधी अधिनियम 2012 में लाया गया था और 2019 में जब इसमें संशोधन किया गया तब यह कानून और भी मजबूत और खतरनाक हो गया इसमें कन्विक्शन रेट बहुत ज्यादा है अधिकतर लोगों को इसमें सजा हो ही जाती है लेकिन कुछ मुद्दों पर ध्यान दिया जाए और उनकी इस उसको लड़ने के दौरान अच्छे से लड़ा जाये तो जीता भी जा सकता है और मुकदमा रद्द भी हो सकता है इसलिए हम आपको बताएंगे की केस को लड़ते समय कौन सी ऐसी गलतियाँ हैं जो आपको नहीं करनी चाहिए|

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एक मजबूत वकील की बेहद जरूरत

अगर आप पॉक्सो एक्ट में आरोपी हैं तो आपके लिए जो सबसे पहली जरूरत है वो एक मजबूत वकील की जरूरत है जिसे कानून का अच्छा ज्ञान और अनुभव हो ऐसा नहीं है कि जो व्यक्ति काला कोट पहन रहा है आप उसे ही अपने केस में वकील रख देते हैं तो फिर आपको सजा से कोई नहीं बचा पाएगा क्योंकि पॉक्सो ऐक्ट का जो कानून है और जो इसमें सजा देने की प्रावधान हैं वो काफी कठोर है इसमें आरोपी को मुकदमा दर्ज होने के बाद से ही अपराधी मान लिया जाता है जब तक ये मुकदमा रद्द नहीं हो जाता है इसलिए एक अच्छे वकील की आपको सबसे पहले जरूरत पड़ती है|

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मजबूती से साक्ष्य  को रखना

अगर आपके खिलाफ़ पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया है तो पुलिस आपको कभी भी गिरफ्तार कर सकती है और यह गैर जमानती अपराध है इसमें जमानत भी जल्दी से नहीं होती है ऐसे में आप अपने वकील के माध्यम से साक्षियों को अच्छे तरीके से रखे हो सकता है कि जिस दिन बच्चा या फिर पीड़िता घटना बता रही हो  उस दिन आप उस शहर में हो ही ना अगर आपके पास कुछ ऐसे साक्ष्य हैं उन  साक्षियों को वहाँ पर रखिये क्योंकि यहाँ पर खुद को निर्दोष  साबित करने का जो भार  है वो आपके ऊपर होता हैऔर यहाँ अगर आपने थोड़ी भी चूक कर दी तो निश्चित है कि आपको सजा हो जाएगी|

ज़मानत से ज्यादा मुकदमे पर दें ध्यान

अगर आपका कोई सगा-सम्बन्धी पॉक्सो एक्ट के मामले में अपराधी हैं तो सबसे पहले उसकी जमानत से ज्यादा मुकदमे पर ध्यान दें क्योंकि जमानत इसमें एक दर्द निवारक दवाई की तरह होती है जो थोड़े समय तक के लिए दर्द को दूर कर सकती है लेकिन अगर सही तरीके से केस को नहीं लड़ा गया तो लंबी सजा भी हो सकती है कोई मतलब नहीं रह जाता ऐसे में आपको को खुद पहले समझना होगा इसमें बहुत ज्यादा धाराएं भी नहीं है और फिर उस मुकदमे की दिशा में काम करना होगा आपको अच्छे से क्रॉस क्वेश्चन भी वकील से करवाने होंगे पीड़िता की द्वारा बताए गए दिए गए दलीलों को अच्छे से विश्लेषण करना होगाकि क्या पीड़िता जो बातें बता रही है वो सही है अथवा झूठ है अगर झूठ है तो मजबूती से कोर्ट में उनका विरोध भी करना होगा|

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सहमति का कोई मतलब ही नहीं

पॉस्को ऐक्ट  में बच्चों की उम्र को भी कई चरणों में विभाजित किया गया है ऐसे में अगर आप किसी लड़की की  सहमति के बारे में बताते हैं की सहमति से उसमें आपके साथ में संबंध बनाया सहमति से वो आपके साथ में कही गई तो इसका कोई मतलब ही नहीं है क्योंकि पूरे पॉक्सो ऐक्ट में सहमति का शब्द कहीं इस्तेमाल नहीं नहीं हुआ है पीड़िता ने 164 के तहत बयान दर्ज करवाया कि आरोपी को सजा होनी लगभग तय हो जाती है अगर उसने ठीक तरीके से केस को लड़ा नहीं तो इसलिए आपको सहमति जैसे शब्द का तो कहीं इस्तेमाल ही नहीं कर रहा है ऐसा आपने किया तो समझिए आप फंस गए|

मुकदमा रद्द करवाने के लिए हाईकोर्ट का रुख

ट्रायल कोर्ट में आप का मुकदमा तो चल ही रहा होता है लेकिन आप सीआरपीसी 482 में याचिका दायर कर सकते हैं मुकदमा रद्द  करवाने के लिए हाईकोर्ट में भी अपील कर सकते हैं ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि मुकदमा रद्द नहीं हो सकता कई पॉक्सो के मामले रद्द भी होते हैं लेकिन तब होते हैं जब आप अच्छी तरीके से साक्ष्य को वहाँ पर प्रस्तुत करेंगेआप मगर आप ऐसा करने में असफल रहे हैं तो आपको लंबी सजा के लिए भी तैयार रहना चाहिए|

पीड़िता के बयान का बारीकी से विश्लेषण

अभियोजन पक्ष जो भी बयान देता है उसके बयान का बारीकी से विश्लेषण करना चाहिए कि कहाँ उसके बयान में चूक हो रही है क्या वो ये कहती है कि उसने अपनी माँ के कहने पर मुकदमा लिखवाया या अभियोजन पक्ष वहाँ पर उपस्थित ही नहीं था या कोई और जाकर मुकदमा लिखवा रहा है इन तथ्यों का भी विशेष तौर पर ध्यान रखना चाहिए फिर मेडिकल रिपोर्ट के बारे में भी आपको जानकारी होनी चाहिए की मेडिकल रिपोर्ट पॉज़िटिव आ रहा है या नेगेटिव हालांकि पॉक्सो अधिनियम में मेडिकल रिपोर्ट का भी कहीं कोई जिक्र नहीं है लेकिन कोर्ट ये मानकर चलती है कि अगर मेडिकल रिपोर्ट निगेटिव आ रहा है तो मामला कुछ दूसरा हो सकता है|

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