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Lakadbaggha Review : अंशुमन झा बने टाइगर श्रॉफ की सस्ती कॉपी

देश में इन दिनों आवारा कुत्ते हर गली, मोहल्ले, सोसाइटी और शहर का ज्वलंत मुद्दा हैं। इनकी आबादी इतनी तेजी से बढ़ रही है कि हर दिन इनके हमलों को लेकर खबरें आती ही रहती हैं। स्थानीय एजेंसियों इसके बारे में बने कानूनों से बंधी हैं। अदालतें ज्यादा कुछ खुलकर इस पर कहती नहीं हैं। पशु प्रेमियों और कुत्तों के हमलों के शिकार लोगों के बीच चलते रहने वाले विवादों के अलावा इन श्वान प्रेमियों के अपने पालतू को दूसरों के घरों के सामने नित्यकर्म करा देने के विवाद भी चलते रहते हैं।

वैसे आम तौर पर कुत्तों को इंसान का सबसे वफादार जानवर माना जाता है। फिल्म ‘लकड़बग्घा’ एक ऐसे ही श्वानप्रेमी अर्जुन बख्शी की कहानी है। उसका मानना है कि बेजुबान जानवरों की रक्षा करनी चाहिए। एक दिन जब उसका एक पालतू कुत्ता गायब हो जाता है, तो उसकी खोज में वह कुत्तों की तस्करी करने वाले गिरोह तक पहुंच जाता है।

कुत्तों से लकड़बग्घों तक
अब सवाल यह उठता है कि जब फिल्म में कुत्तों के बारे में बताया गया है तो फिल्म का नाम ‘लकड़बग्घा’ क्यों है? इसके पीछे भी एक ट्विस्ट है। दरअसल, अर्जुन बख्शी जब कुत्तों की तस्करी करने वाले गिरोह के एक एक सदस्यों को मारता है तभी उसकी मुलाकात एक ‘लकड़बग्घा’ से होती है जो तस्करी करने वाले गिरोह के लड़कों पर हमला करता है। अर्जुन बख्शी को डर है कि कहीं ‘लकड़बग्घा उस पर भी हमला न कर दे। समझाया यहां ये गया है कि जानवर तभी किसी पर हमला करते हैं, जब उनको सामने वाले से खतरा महसूस होता है। अर्जुन उसको लेकर अपने घर आता है और घरेलू कुत्तों की तरह उसे भी पालता है।

 

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