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Sidhi: संसार का कोई व्यक्ति या पदार्थ ऐसा नहीं है जिसमें कुछ त्याज्य और कुछ स्वीकार्य न हो – स्वामी श्री मैथिलीशरण जी

सर्वगुण सम्पन्न तो कोई होता ही नहीं

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सीधी|
रोली मैमोरियल सत्संग सभागार सीधी में कल के व्याख्यान में स्वामी जी ने कहा कि हमें यह विचार करना चाहिए कि यदि संसार में कुछ लोगों ने हमें स्वीकार कर लिया है तो उन्होंने भी कोई समझौता ही किया होगा, क्योंकि सर्वगुण सम्पन्न तो कोई होता ही नहीं है। उसको अपने अनुरुप बनाना पड़ता है। हर व्यक्ति और पदार्थ में कुछ स्वीकार्य है और कुछ त्याज्य है; जिस तरह लोग हमारा उपयोग कर रहे हैं, हमें भी उसी तरह उनका करना चाहिए। सारा संसार जब पूर्ण हो जायेगा तब हम कार्य प्रारम्भ करेंगे – ऐसा चाहने वाला पूरे जीवन में कुछ भी नहीं कर पायेगा।


हर फल में, हर धान्य में, हर रसायन में, हर पदार्थ में जो भी हमें त्याज्य दिखाई देता है, वह सृजन के लिए आवश्यक होता है।
“जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहर बारि बिकार।।”
सारी सृष्टि ही गुण और दोष से मिलकर बनी है। जो श्रेष्ठ संत जन हैं वह दुग्ध-रूप गुण को तो ग्रहण कर लेते हैं पर विकार-रूप जल को जला देते हैं। छान लेना, छील लेना, फटक लेना, काट लेना – ये सब सृजन के उपादान हैं। इसके बग़ैर हम कुछ नहीं कर पायेंगे। नाखून काटते हैं, बाल कटवाते हैं, नित्य स्नान करते हैं – यह सब वही है। सत्संग का तात्पर्य यही है – मन को धोना, मन को छानना, मन को छीलना, मन को फटकना आदि।
“मन शांत हो जायेगा तब भजन करेंगे” – ऐसी धारणा हो तो मन शांत करने की साधना ही करते रहो। न किसी का मन शांत हुआ है और न होगा। इसकी जगह अच्छा यह है कि भजन करो। मन अपने आप शान्त हो जायेगा।
समुद्र में रहने वाले जलचर, जो जीवन में रहने वाले बिकार – काम, क्रोध, लोभ, मद्, मत्सर, ईर्ष्या आदि के प्रतीक हैं, समुद्र में रहकर ये सारे विकार आपस में ही एक दूसरे को खाकर अपनी क्षुधा शांत कर रहे हैं, पर एक बार ऐसा हुआ कि बंदरों ने समुद्र पर पत्थरों का पुल बना दिया। सेना बहुत बड़ी, पुल बहुत संकरा – सेना कैसे पार हो?
तब भगवान ने एक कौतुक किया! बंदरों के द्वारा बनाऐ गये पुल के ऊपर जाकर खड़े हो गये। सारे जलचर भगवान के रूप माधुर्य को देखकर बाहर निकल आये –
“देखन कहुँ सब करुनाकंदा। प्रगट भये सब जलचर वृन्दा।।
तिन्ह की ओट न देखिय बारी। मगन भये हरि रूप निहारी।।”
जो जलचर दुर्गुण-दुर्विचार के रूप थे, वे भगवान का रूप देखकर मग्न हो गये, मानो देह की सुध-बुध भूल गई। अर्थात्, दुर्गुण दुर्गुण तब तक हैं जब तक उन्होंने भगवान को नहीं देखा है। भगवान को देखने के बाद ये अपनी बुराई को छोड़कर भगवान से एकाकार हो गये। बुराई को जीवन से दूर करने का एक मात्र साधन यही है कि भगवान का भजन, भगवान का दर्शन, भगवान का ध्यान, जप, नाम-कीर्तन आदि किया जाय।


भगवान ने कहा कि अब तो पूरे समुद्र में जलचर हैं, जल तो कहीं है ही नहीं। आप लोग चाहे जिधर से चाहें, चले जाइये!
बंदर बोले – महाराज, हम जायेंगे तो बाद में। पहले कृपा करके यह बताइये कि जब आप इतना सुंदर जलचरों का पुल बना सकते थे, तो आपने हमसे ये पत्थर क्यों ढुलवाये?
भगवान राम ने करुणामयी दृष्टि से बंदरों की ओर देखा और कहा कि यह बताओ कि हमने जो पुल बनाया, वह कहाँ खड़े होकर बनाया? बंदरों ने कहा कि आपने हमारे पत्थरों के पुल पर खड़े होकर पुल बनाया। तो भगवान ने कहा कि साधक स्वयं अपने पुरुषार्थ का पुल बनाता है। उस पुरुषार्थ रूपी पुल पर खड़े होकर ही मैं अपनी कृपा का पुल बनाता हूँ ।
कृपा में कमी मत निकालो, कृपा को स्वीकार करलो। शहर के तमाम गण्यमान्य लोगों का महाराज श्री की इस सुगम और सर्वसुलभ कथा में तांता लगा रहा ।
कल कथा की पूर्णाहुति होगी
आज की कथा में प्रमुख रूप से श्री अमिताभ मिश्र (प्रधान जिला न्यायाधीश), श्रीमती पूनम मिश्रा (मैडम डी जे), चन्द्रमोहन गुप्ता, रुद्र प्रताप सिंह “बाबा”, श्रीमती अंजू केशरी, रवि केशरी, श्रीमती मीना गुप्ता, लालमणि सिंह, भाजपा सीधी अध्यक्ष इन्द्रशरण सिंह चौहान, भागवत प्रसाद पाठक, रुक्मिणी प्रसाद मिश्र, कन्हैया सिंह, राजेन्द्र सिंह सेंगर (डाइट सीधी), श्रीमती राधा सिंह (कन्या सीधी), मंगलेश्वर सिंह चौहान, बृजेन्द्र बहादुर सिंह चौहान, रुद्र प्रताप सिंह चौहान (सेवा. प्राध्यापक), जे. एल. पाण्डेय, राममणि शुक्ल, राममणि त्रिपाठी, यज्ञ नारायण सोनी, जे. पी. मिश्र, डॉ. रामलला शर्मा, आलोक सिंह, श्रीमती राधा सिंह, राजेन्द्र सिंह गहरवार, डा. रावेन्द्र सिंह (प्राध्यापक), श्री योगेश प्रताप सिंह (सीधी खुर्द), उत्कर्ष गुप्ता, श्रीपाली गुप्ता, बृजेन्द्र प्रसाद मिश्र, मनोज तिवारी एवं योगेन्द्र पाठक तथा रामकिंकर विचार मिशन एवं शिष्य मण्डल सहित सीधी के विशिष्ट, प्रबुद्ध एवं गण्यमान्य कथा प्रेमी और सत्संगी उपस्थित रहे। डॉ. रामलला शर्मा द्वारा मंच का बोधगम्य संचालन किया गया।

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