भारतमध्यप्रदेश

।गूढ़उ तत्त्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जब पावहिं।।

 

“श्रोता बक्ता ग्यान निधि कथा राम कै गूढ़” – गूढ़ कथा की निगूढ़ और हृदयस्पर्शी व्याख्या से सीधी तमाम बुद्धिजीवी हुए गद्गद रोली मैमोरियल सीधी में हुई कथा की पूर्णाहुति।

परशुराम जी की मतिपटल के द्वार भगवान राम की मृदु परन्तु गूढ़ भाषा के कारण खुले। वे नितांत अहंशून्य होकर भगवान राम और श्रीलक्ष्मण को इंगित करते हुए यह स्वीकार कर लेते हैं कि मैंने अज्ञानतावश आपके समक्ष बहुत अनुचित बातें बोल दीं, कृपया आप दोनों भाई क्षमानिकेत हैं, हमें क्षमा कीजिए। स्वामी मैथिलीशरण जी ने कहा कि अपनी भूल को स्वीकार कर लेना भी ज्ञान है।

रामकथा के तृतीय वक्ता महर्षि याज्ञवल्क्य ने भी त्रिकालदर्शी भरद्वाज जी से यही कहा कि यद्यपि आप रामकथा के सारे रहस्य जानते हैं –
“चाहहु सुनै रामगुन गूढ़ा। कीन्हेउ प्रश्न मनहुँ अति मूढ़ा।।”
पर, गूढ़ तत्त्व को जानने के लिये पहले विनम्र और शालीन बनना होता है। भरद्वाज ने याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया राम और रामकथा को लेकर, पर उत्तर में याज्ञवल्क्य ने पहले रामकथा न कहकर शिव का चरित्र और सती और पार्वती के दोनों जन्मों की कथा सुनाई और बाद में रामकथा सुनाई। इसका तात्पर्य बताते हुए स्वामी जी कहते हैं कि याज्ञवल्क्य ने भरद्वाज जी से कहा कि –

“प्रथमहिं मैं कहि सिव चरित जाना मरमु तुम्हार।
सुचि सेवक तुम राम के रहित समस्त बिकार।।”

मैं चाहता था कि पहले तुम्हें विश्वास के घनीभूत स्वरूप शिव की कथा सुना दूँ, जिनके हृदय में सदा श्रीराम का निवास रहता है, जिनकी पत्नी सती रूप में भगवान को नहीं पा सकीं, अपितु उनको श्रद्धामयी पार्वती बनकर ही वह दिव्य रामकथा मिली जो संसार के कल्याण का कारण बनी। बिना श्रद्धा और विश्वास के रामकथा अत्यन्त सरल होते हुए भी अत्यन्त गूढ़ लगती है।

दशरथ जी का सत्य प्रेम और जनक जी में गूढ़ प्रेम की व्याख्या के द्वारा मानस के अनेक प्रसंगों को सुनाकर स्वामी जी ने रामचरित मानस को सीधे जीवन से जोड़ दिया। भगवान श्रीराम की इस पावन कथा में अनेक युवक और नवयुवतियाँ भी सम्मिलित हुए। स्वामी जी ने श्रोताओं को सम्बोधित करते हुए कहा कि जब तक हम समाज में एक दूसरे की गुणवत्ता को नहीं स्वीकार करेंगे, तब तक हमारा ज्ञान, भक्ति और कर्म किसी सुफल को जन्म नहीं दे सकता है।

कथा के अंत में वरिष्ठ अधिवक्ताद्वय लालमणि सिंह एवं चंद्रमोहन गुप्ता ने अपने भावपूर्ण उद्बोधन से वक्ता और श्रोताओं को आनंदित कर दिया। उन्होंने कहा कि रामकथा को सीधे हमारे जीवन से जोड़कर स्वामी जी ने मानस की लौकिक व्याख्या के साथ-साथ उसकी अलौकिकता को और भी निखारने का कार्य किया है।

आज की कथा में प्रमुख रूप से श्रीमती काजल वर्मा (अध्यक्ष, नगर पालिका परिषद सीधी), चन्द्रमोहन गुप्ता, रुद्र प्रताप सिंह “बाबा”, श्रीमती मीना गुप्ता, लालमणि सिंह, भाजपा सीधी अध्यक्ष इन्द्रशरण सिंह चौहान, डॉ. राजेश मिश्र, यदुवंश भूषण जी महाराज, भागवत प्रसाद पाठक, रुक्मिणी प्रसाद मिश्र, कन्हैया सिंह, राजेन्द्र सिंह सेंगर (डाइट सीधी), श्रीमती राधा सिंह (कन्या सीधी), मंगलेश्वर सिंह चौहान, बृजेन्द्र बहादुर सिंह चौहान, रुद्र प्रताप सिंह चौहान (सेवा. प्राध्यापक), जे.एल. पाण्डेय, राममणि शुक्ल, राममणि त्रिपाठी, यज्ञ नारायण सोनी, जे.पी. मिश्र, राकेश शुक्ला,

श्रीमती सुजाता मिश्रा, श्रीमती सुनीता सिंह, श्रीमती पुष्पा सिंह, श्रीमती प्रतिमा शुक्ला, डॉ. रामलला शर्मा, आलोक सिंह, डा. रावेन्द्र सिंह (प्राध्यापक), श्री पुण्डरीक सिंह, विष्णु पाण्डेय, श्रीमती आरती पाण्डेय, उत्कर्ष गुप्ता, श्रीपाली गुप्ता, बृजेन्द्र प्रसाद मिश्र, मनोज तिवारी एवं योगेन्द्र पाठक तथा रामकिंकर विचार मिशन एवं शिष्य मण्डल सहित सीधी के विशिष्ट, प्रबुद्ध एवं गण्यमान्य कथा प्रेमी और सत्संगी उपस्थित रहे। डॉ. रामलला शर्मा द्वारा मंच का बोधगम्य संचालन किया गया।

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