मध्यप्रदेश

सूक्ष्म संकल्प भगवान के भजन से जोड़ता है – बाला ब्यंकटेश।

सूक्ष्म संकल्प भगवान के भजन से जोड़ता है – बाला ब्यंकटेश।
पूजापार्क की श्रीमद्भागवत कथा का तृतीय दिवस
सीधी 12 जनवरी
संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा जो पूजापार्क में 10 जनवरी से चल रही है, उस कथा के लब्धप्रतिष्ठ कथा व्यास पं बालाव्यंकटेश महराज जी व व्यास पीठ का  समुपस्थित श्रद्धालु श्रोताओ द्वारा अभिनन्दन बन्दन लालमणि सिंह अधिवक्ता, सुरेन्द्र सिंह बोरा, श्रीमती कुमुदिनी सिंह, अंजनी सिंह सौरभ, डाॅ श्रीनिवास शुक्ल सरस, मनोज तिवारी, प्रहलाद प्रसाद गुप्त, डाॅ रामसुशील शुक्ल, देवेन्द्र सिंह दादू, संतोष सिंह माधुरी, धीरेन्द्र सिंह परिहार, आदि ने किया। कथा के प्रसंग को विस्तार देते हुए पं बालाव्यंकटेश महराज जी ने कहा कि शुकदेव सतगुरु हैं तथा सात गुणों से संतृप्त हैं इसलिए चलते फिरते तीर्थ यदि कहा जाय तो अतिसंयोक्ति नही होगा। ब्यास जी ने यह भी बताया कि परीक्षित अहंकार को त्यागकर आस्था विश्वास के साथ कथा का श्रीमद्भागवत कथा श्रवण किये  इसलिए कल्याण हो गया।
परीक्षित जी कथा अपनी मुक्ति के लिए नही सुने बल्कि मानव कल्याण के लिए ऐसा उत्सव उन्होने किया है। क्योंकि उनकी मुक्ति तो गंगा दर्शन से कथा के पहले ही हो चुकी थी। कथा के प्रसंग को और आगे बढाते हुए महराज जी ने उद्घाटित किया कि भगवान की घोषणा है कि यदि हमारी कथा का आनन्द लेना हो तो परिवार में रहते हुए भी कमल की तरह कीचड से अलग रहना होगा। कहने का अभिप्राय यह कि गृहस्थ में रहते हुए भी उससे उबर कर भगवत भजन कीर्तन करने से मानव का कल्याण संभावित है। आज की कथा में अनेक समसामयिक उध्दरण तथा सार्थक दृष्टान्त प्रस्तुत करते हुए ब्यास जी ने कथा को विशेष श्रवणीय बना दिये। ब्यास जी ने बताया कि मानव मात्र की सार्थकता के लिए जो प्रश्न किया जाता है उसे समप्रश्न कहा जाता है। जब परीक्षित जी ने कथा के समय समप्रश्न किया तब शुकदेव जी ने भागवत के श्लोक के माध्यम से उत्तर दिया कि हे राजर्षि जो अपने आपको भगवान के चरणों में दृढ संकल्प के साथ लगा देता है उसे कार्य की सिद्धि मिल जाती है। आगे व्यासजी ने बताया कि मन का संकल्प दो प्रकार का होता है। एक स्थूल और दूसरा सूक्ष्म। यही कारण है कि परीक्षित जी ने सूक्ष्म संकल्प के लालायित हुआ इसलिए उन्हे कृष्ण की कृपा मिल गई। इसीलिए भगवत प्राप्ति के सूत्र में यह बताया गया है कि सूक्ष्म संकल्प भगवान के साथ जोड़ता है। ठीक इसके विपरीत स्थूल संकल्प सतपथ से भटका देता है और दस इन्द्रियों की ओर मन को अग्रेषित कर देता है जिससे कालुष्य मन को ग्रषित कर लेता है। महराज जी ने रोचक प्रसंगानुसार बताये कि जब इन्द्रियों का मुख विषय की ओर हो जाता है तब जितसंगो की संज्ञा मिल जाती है। किन्तु जब हमारी इन्द्रिया भगवान की भक्ति की ओर उन्मुख हो जाती हैं तब वही इन्द्रिया जितेन्द्रिय बन जाती हैं। इस भाॅति कथा के कथानक को बोधगम्य शैली में ब्यास जी कथा उद्घाटित करते हुए भक्तो को मंत्र मुग्ध कर दिये। आज की कथा में सुरेश सिंह चौहान डेम्हा और देवेन्द्र सिंह मुन्नू सहित भक्तों  की अच्छी खासी उपस्थित रही।

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