मध्यप्रदेश

पूजापार्क की श्रीमद्भागवत कथा का पाॅचवा दिवस – श्रीकृष्ण की लीला शब्दार्थ की नही वल्कि भावार्थ की है – बालाव्यंकटेश।

पूजापार्क की श्रीमद्भागवत कथा का पाॅचवा दिवस – श्रीकृष्ण की लीला शब्दार्थ की नही वल्कि भावार्थ की है – बालाव्यंकटेश।
सीधी/14जनवरी 
कथा प्रवक्ता वृन्दावनोपासक पं बालाव्यंकटेश महराज जी एवं भागवत भगवान का सीधी के श्रद्घालु भक्तों द्वारा  पूजा अर्चना परम्परागत सांस्कृतिक मान्यतानुसार की गई। व्यासपीठ की पूजा के बाद श्री कृष्ण रसामृत समिति के पदाधिकारी  लालमणि सिंह अधिवक्ता, सुरेन्द्र सिंह बोरा,श्रीमती कुमुदिनी सिंह,अंजनी सिंह सौरभ,मनोज तिवारी,ने माल्यार्पण से स्वागत वन्दन  किया।आज की कथा के प्रारंभ में  महराज जी ने समुपस्थित भक्तों को  मकरसंक्रांति की शुभकामना देते हुए कहा कि जो स्वाध्याय के पथ पर चलता है वही पकता है और जो परिपक्व हो जाता है तभी उसके उलझनों की ग्र॔थि खुलती है। आगे व्यास जी ने बताया कि *प्रेम संयोग में नही वल्कि वियोग में परिपक्व होता है।*गोपियों के वियोग का उदाहरण देते हुए महराज जी ने कहा कि  उनका विरह जितना ही बढता जाता है  उनका प्रेम उतना ही बढता जाता है।यदि हृदय का प्रेम  सगुण साकार नही होगा तब तक ब्रम्ह स्वरूप साकार का बोध भी नही होसकेगा।अतएव निराकार ब्रम्ह साकार रूप में प्रेम की परिभाषा प्रतिष्ठित करने भक्तों के बीच में आते हैं।अनेक प्रसंगों के सार तत्व को परोसकर भक्तो को एक दुर्लभ सूत्र दिये कि हमारे
कृष्ण की लीला शव्दार्थ की नही भावार्थ की है।
इसीलिए उनकी लीला एक नही वरन  विविध वर्णी है।उन्होने कहा कि गिरिराज की लीला बृज की ताज है , जिससे भक्तों ने कृषण के मार्ग  को सरल बताया गया है  गरल नही।वेद और पुराणों की भी उद्घोषणा है कि हमारे कृष्ण की लीला  उलझाने की नही सुलझाने की नही। हाॅ एक बात अवश्य है  कि  कृष्ण के प्रेमी अल्हड होते हैं तभी तो गोपियों ने उद्भव से  कहा था  कि हमें प्रेम के पाठ से भटकाकर  ज्ञान के सूत्रों  की ओर न उन्मुख करो क्योकि हमें  इतना पता है कि प्रेम का पन्थ निराला होता है। दृष्टान्त के अन्तर्गत महराज जी ने बताया  कि  राम और कृष्ण के प्रेम को  वन के वंदर,माता सवरी  और इसी भाॅति  वृज के पशु पक्षी तथा गोपियाॅ समझ गईं  किन्तु  हम मानव तन पाकरके भी अंगीकार करना तो दूर रहा आंशिक रूप में भी नही समझ पाये।भागवत कथा के बाल लीला के प्रसंगानुसार  कथानक प्रस्तुत करते हुए महराज जी ने कहा कि आनन्द की कोई सीमा नही होती है क्योंकि आनन्द ही कृष्ण और कृष्ण ही आनन्द है।आगे की कथा में व्यास जी ने  ‘नन्द के आनन्द भयो जै कन्हैया लाल की ‘ कथ्य को रूपायित करते हुए बताया कि नन्द के घर में खुसी लाने में आचार्य गुरुदेव की सहभागिता रही है।नन्द के आगन में मेरा कन्हैया जब आया  तब बावा नन्द ने  अपना खजाना  दान के लिए खोल दिया  क्योंकि सारा खजाना के देने बाले श्रीकृष्ण हैं और लेने बाले भी वही हैं।कथा के प्रसंग को और आगे बढाते हुए  लब्ध प्रतिष्ठ कथा प्रवक्ता बालाव्यंकटेश महराज ने यह भी कहा कि वृजवासी बावा से बधाई लेते हैं और बधाई देते भी हैं और आगे बढा देते हैं।कारण यह कि  जड तथा चेतन दोनों से एक साथ प्रेम नही हो सकेगा । ऐसा इसलिए क्योंकि कृष्ण के उपासक पदार्थ के भूखे नही  वे प्रेम के पोषक होते हैं।इसलिए वृजवासियों का दृष्टिकोण और दृष्टि व्यापक है।उन्होने श्री कृष्ण की रज और उसकी सत्ता को भलीभाॅति समझा है।कुल मिलाकर  यदि कृष्ण का प्रेम पाना चाहते हो तो  परीक्षित की भाॅति पिपाशु तथा जिज्ञासु बनकर कथा में बैठो तभी  उसके चरणों की कृपा रज मिलेगी। आगे व्यास जी ने कहा कि यदि वर्फ की पुतलियाँ  सागर की गहराई पा सकती हैं  तो  ऐसा नही हो सकता कि आजका मानव  दृढ आस्था विश्वास के साथ  अपने आपको कृष्ण के चरणों में लगादे  तो उसकी कृपा न मिले।संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा भजनों के साथ अनवरत साढे छ बजे तक चलती रही और श्र द्धालु  श्रोतागण भाव विभोर होकर अमृतमयी कथा का रसपान करते रहे।

[URIS id=12776]

Related Articles

Back to top button