मध्यप्रदेश

अजय सिंह राहुल के संकल्प से श्री रूद्र महायज्ञ श्री शिव महापुराण कथा का हुआसमापन।

अजय सिंह राहुल के संकल्प से श्री रूद्र महायज्ञ श्री शिव महापुराण कथा का हुआसमापन दिवस
आज महाप्रसाद वितरण और विशाल भंडारे का आयोजन

सरल, सौम्य और आशुतोष हैं भगवान शिव
28 अप्रैल,2023
श्री शिव पुराण महा कथा के सातवें दिन कथावाचक आचार्य विनोद बिहारी गोस्वामी ने शिव के अर्धनारीश्वर स्वरूप बारह ज्योतिर्लिंग की स्थापना सहित रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन कर कथा का समापन किया। पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह राहुल भैया के संकल्प से सांडा शिवराजपुर में आयोजित श्री रूद्र महायज्ञ एवं श्री शिव महापुराण कथा का समापन हुआ समापन दिवस पर अर्धनारीश्वर स्वरूप के बारे में आचार्य विनोद ने बताया कि सृष्टि के आदि में जब सृष्टिकर्ता ब्रह्मा द्वारा रची हुई सृष्टि विस्तार को प्राप्त नहीं हुई, तब ब्रह्मा जी उस दु:ख से अत्यंत दु:खी हुए । उसी समय आकाशवाणी हुई – ‘ब्रह्मन ! अब मैथुनी सृष्टि करो ।’ उस आकाशवाणी को सुनकर ब्रह्मा जी ने मैथुनी सृष्टि करने का विचार किया, परंतु ब्रह्मा की असमर्थता यह थी कि उस समय तक भगवान महेश्वर द्वारा नारीकुल प्रकट ही नहीं हुआ था इसलिए ब्रह्मा जी विचार करने के बाद भी मैथुनी सृष्टि न कर सके । ब्रह्मा जी ने सोचा कि भगवान शिव की कृपा के बिना मैथुनी सृष्टि नहीं हो सकती और उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रमुख साधन उनकी तपस्या ही है । ऐसा सोचकर वे भगवान शिव की तपस्या करने के लिए प्रवृत्त हुए । उस समय ब्रह्मा जी शिव सहित परमेश्वर शंकर का प्रेमसहित ध्यान करते हुए घोर तप करने लगे ।ब्रह्मा के उस तीव्र तप से शिव जी प्रसन्न हो गये । फिर कष्टहारी शंभु सच्चिदानंद की कामदा मूर्ति में प्रविष्ट होकर अर्धनारीश्वर रूप में ब्रह्मा के समक्ष प्रकट हुए । उन देवाधिदेव भगवान शिव को पराशक्ति शिवा के साथ एक ही शरीर में प्रकट हुए देखकर ब्रह्मा ने भूमि पर दण्ड की भांति लेटकर उन्हें प्रणाम किया । तदंतर विश्वकर्मा महेश्वर ने परम प्रसन्न होकर मेध की सी गंभीर वाणी में उनसे कहा – ‘वत्स ! मुझे तुम्हारा संपूर्ण मनोरथ पूर्ण हो।ब्रह्मा जी को दिये गये वरदान के अनुसार भगवती शिवा ने दक्ष की कन्या होकर अवतार ग्रहण किया । इस प्रकार भगवान अर्धनारीश्वर की कृपा से मैथुनी सृष्टि की परंपरा चल पड़ी । इस प्रकार भगवान शिव ने अर्धनारीश्वर का रूप लेकर सृष्टि की रचना की।


बारह ज्योतिर्लिंग का वर्णन
भगवान शिव सरल, सौम्य और आशुतोष हैं। उन्हें सिर्फ जल और बिल्व पत्र से प्रसन्न किया जा सकता है। धरा पर देवादि देव महादेव के 12 ज्योतिर्लिंग विराजमान हैं। कहा जाता है कि अपने संपूर्ण जीवनकाल में इन 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने से सात जन्मों के पाप कट जाते हैं। शिव महापुराण के कोटि रूद्र संहिता के अन्तर्गत महाशिव के ज्योतिर्लिंग के बारह स्वरूपों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें सुनने मात्र से भी पाप दूर हो जाते हैं। आइये आज हम आपको इस मंत्र के बारे में बताते हैं जिसके जप से एक साथ 12 ज्योतिर्लिंगों का स्मरण कर महादेव को प्रसन्न किया जाता है।सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालं ओम्कारम् अमलेश्वरम्॥ परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥ वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे। हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥ एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः।प्रतिदिन प्रात: इन बारह नामों का पाठ करता है वह सब पापों से मुक्त हो संपूर्ण सिद्धियों का फल पाता है।


रुद्राक्ष की उत्पत्ति एवं महिमा
रुद्राक्ष का अर्थ है रुद्र का अक्ष। यानी भगवान रुद्र की आंखें। माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के अश्रुओं से हुई है। उन्होंने कठोर तप के बाद जब आंखें खोली तो उनके आंखों से जो आंसू भूमि पर गिरे उसे से रुद्राक्ष की उत्पत्ति हुई।शिवपुराण में रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन करते हुए भगवान शिव कहते हैं कि रुद्राक्ष मालाधारी मनुष्य को देखकर मैं शिव, भगवान विष्णु, देवी दुर्गा, गणेश, सूर्य तथा अन्य देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं।रुद्राक्ष धारण करना अत्यंत शुभ एवं मंगलकारी है।रुद्राक्ष धारण करने वाले व्यक्ति को सात्विक होना चाहिए,

कुमार कार्तिकेय के जन्म की अति विस्मयकारी कथा
शिव और माता पर्वती के प्रथम पुत्र गणेशजी नहीं बल्कि कुमार कार्तिकेय हैं। मयूर की सवारी करने वाले, शक्तिशाली कुमार कार्तिकेय के जन्म की कथा भी अति रोचक है भगवान शिव ने अधर्मी दैत्य तारकासुर को एक वरदान दिया जिसके कारण वह अत्यंत शक्तिशाली हो गया था। वरदान यह था कि उसका अंत केवल और केवल शिवपुत्र के हाथों ही होगा। वरदान पाने के बाद वह तीनों लोकों में हाहाकार मचाने लगा। यहां तक कि तारकासुर के नेतृत्व में दैत्यों से देवताओं को पराजय का भी सामना करना पड़ता है। सृष्टि में तारकासुर समेत दैत्यों का अत्याचार बढ़ने लगा था, अंततः सभी देवता भगवान ब्रह्मा के पास पहुंचे और तारकासुर से संबंधित समस्या के बारे में उन्हें बताया। इस पर ब्रह्माजी ने देवताओं को सुझाव दिया कि वे कैलाश जाकर भगवान शिव से पुत्र उत्पन्न करने की विनती करें क्योंकि उनका ही पुत्र तारकासुर का वध कर सकता है।दूसरी तरफ देवराज इंद्र और अन्य देवगण भगवान शिव के पास जाते हैं लेकिन वे तो साधना में लीन होते हैं। यह वहीं समय था जब भगवान शिव माता सती के वियोग में थे और गहन साधना में स्वयं को लीन कर चुके थे। किसी को तो आगे जाना ही था, तब देवताओं में से एक कामदेव ने उनकी ध्यान को भंग करने की कोशिश की, जिसका परिणाम यह हुआ कि उन्हें भगवान शिव ने भस्म कर दिया। इधर देवी पार्वती भी शिव को पति रूप में पाने के लिए तपस्या में लीन थीं। तब भगवान शिव ने पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर शुभ घड़ी और शुभ मुहूर्त में उनसे विवाह कर लिया। कार्तिकेयजी माता पार्वती और भगवान शिव के जैविक पुत्र नहीं है लेकिन वो शिवजी के अंश अवश्य हैं। कार्तिकेय का जन्म कुछ इस तरह हुआ कि शिवजी के तेज से एक प्रकाश पुंज निकला और यह पुंज इतना शक्तिशाली था कि इसे अग्नि, पर्वत, ऋषि-मुनियों की पत्नियां भी संभाल नहीं पा रही थीं। शिवांश का तेज इतना अधिक था कि कोई भी उसे संभाल नहीं सका।जब यह तेज धरती पर पड़ा तो धरती माता से भी इसे संभालना कठिन हो गया, इसके बाद यह तेज पुंज चलता ही रहा और देवी गंगा के जल में तैरने लगा लेकिन देवी गंगा भी उस प्रकाश पुंज को नहीं सहन कर पाईं और उसे सरकंडे के एक वन में त्याग दिया। समय के बीतने के साथ ही शिवांश एक बालक रूप में परिवर्तित हुआ। छह मुख वाले उस बालक का पालन पोषण कृतिकाओं ने किया था, जिसके कारण ही उस बालक का नाम कार्तिकेय पड़ा। शिवजी के तेज से उत्पन्न हुए इस बालक का यानी कार्तिकेयजी का वन में ही पालन पोषण होने लगा। कृतिकाएं एक माता की भांति बालक का ध्यान रखती थीं।
उधर माता पार्वती ने भी एक तेजवान बालक कार्तिकेय के बारे में सुना और इस बारे में भगवान शिव को भी बताया। इस पर भगवान शिव ने उन्हें जानकारी दी कि कार्तिकेय उनके ही पुत्र हैं। इसके बाद शिवजी ने अपने गणों को बुलाया और कहा कि ‘तुम उस सरकंडे के वन में जाओ, हमारा पुत्र है, उसे सम्मान के साथ लेकर आओ।शिवजी के आदेश के बाद शिव गण उस वन में पहुंचे और कुमार कार्तिकेय को कृतिकाओं के साथ बड़े सम्मान से शिवजी के सामने ले आए। उस बालक को देखकर कैलाश पर्वत पर आनंद छा गया। वहीं, कार्तिकेयजी के आ जाने के बाद वह समय भी आ गया जब उन्हीं शिवपुत्र के द्वारा तारकासुर का वध होना था। शिवपुत्र कार्तिकेयजी अत्यंत वीर थे और उन्हें तारकासुर का वध भी करना था, ऐसे में सभी देवता उनके नेतृत्व में चल पड़े और तारकासुर पर आक्रमण कर दिया। इस तरह तारकासुर शक्तिशाली कार्तिकेय के सामने एक क्षण भी टिक नहीं सका और शिवपुत्र के हाथों अपने अंत को प्राप्त हुआ।कथा श्रवण में प्रमुख रूप से विधायक चित्रकूट नीलांशु चतुर्वेदी,विधायक रैगांव कल्पना वर्मा,विधायक खजुराहो विक्रम सिंह नातीराजा,विधायक उदयपुरा देवेंद्र पटेल,यदुनाथ तोमर ग्वालियर,योगेंद्र तोमर ग्वालियर पूर्व विधायक उषा चौधरी,पूर्व मंत्री कमलेश्वर द्विवेदी, पूर्व सांसद मानिक सिंह, चंद्रप्रकाश बस छत्तीसगढ़, जिला अध्यक्ष ज्ञान सिंह, मझौली नप अध्यक्ष शंकर गुप्ता, सहित हजारों महिलाएं पुरुष एवं शिवभक्त शामिल रहे महाराज जी का स्वागत राजेंद्र तोमर,अशोक सैनी,पूर्व विधायक अभय मिश्रा,राजभान सिंह सतना,ज्ञानेन्द्र अग्निहोत्री,एड चंद्र मोहन गुप्ता, शैलेंद्र सिंह चौहान,अंबिकेश पांडे, वीरेंद्र सिंह,हर्षदेव सिंह बुढ़वा, श्रीमती सावित्री सिंह उमरिया, श्रीमती कमलेश सिंह गौड़, डॉ महेंद्र तिवारी,इंद्रभान यादव, सुग्रीव बैसवार,राजेंद्र यादव,ममता सिंह,किरण सिंह, दिलीप सितानी,तिलकराज सिंह पोस्ता,राम लखन कुशवाहा रामपुर,अखिलेश सिंह,अशोक सिंह,रमाकांत पंडित जी,तीरथ साहू, विजय सिंह पटपारा,स्वामी चरण सिंह,महादेव सिंह गौड़, पत्रकार जगन्नाथ दुबेदी,अजय पांडे,राजेश सिंह,जितेंद्र सिंह ने कथावाचक का माल्यार्पण से स्वागत किया।

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